'परीक्षा पे चर्चा' में प्रधानमंत्री मोदी ने बच्चों से कहा - मुश्किल प्रश्नों को पहले हल करे


 Satyakam News | 07/04/2021 8:11 PM


नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'परीक्षा पे चर्चा’ कार्यक्रम के तहत बच्चों से बातचीत की। पीएम ने कहा, उम्मीद है कि परीक्षा की तैयारी अच्छी चल रही होगी। यह पहला वर्चुअली प्रोग्राम है। हम डेढ़ साल से कोरोना के साथ जी रहे हैं। मुझे आप लोगों से मिलने का लोभ छोड़ना पड़ रहा है। नए फॉर्मेट में आपके बीच आना पड़ रहा है। आपसे न मिलना यह मेरे लिए बहुत बड़ा लॉस है। फिर भी परीक्षा तो है ही। अच्छा है कि हम इस पर चर्चा करेंगे।

एम पल्लवी- कक्षा 9 की स्टूडेंट (प्रकाशम, आंध्र प्रदेश) का सवाल- सर, हम अक्सर ऐसा महसूस करते हैं कि पूरे साल पढ़ाई ठीक चल रही होती है लेकिन परीक्षा नजदीक आते ही बहुत तनाव हो जाता है। कृपया कोई उपाय बताएं।

अपर्ण पाण्डेय, 12वीं के छात्र मलेशिया से- परीक्षा की तैयारी के दौरान हमारे मन में आने वाले भय और तनाव से हम कैसे उबरें?

PM मोदी का जवाब- पल्लवी, अर्पण...देखिए जब आप डर की बात करते हैं तो मुझे भी डर लग जाता है। क्या पहली बार एग्जाम देने जा रहे हैं क्या, कैसा डर? सब पता है आपको, डरने की जरूरत नहीं। आपको डर न आने का नहीं है। आपके आस-पास ऐसा माहौल बना दिया गया है कि यही सब कुछ है। पैरंट्स, रिश्तेदार, पड़ोसी जैसे लोग ऐसा माहौल बना देते हैं कि आपकों किसी बहुत बड़ी घटना से गुजरना है। यह ठीक नहीं है। जिंदगी में यह कोई आखिरी मुकाम नहीं है। यह एक छोटा सा पड़ाव है। हमें दबाव नहीं बनाना चाहिए। टीचर हों, परिवार हो, दोस्त हो...बाहर का प्रेशर नहीं बनेगा तो कॉन्फिडेंस बढ़ेगा।

पहले मां-बाप बच्चों के साथ कई विषयों पर जुड़े रहते थे और सहज भी रहते थे। आजकल मां-बाप करियर, पढ़ाई सैलेबस तक बच्चों के साथ इंवॉल्व रहते हैं। अगर मां-बाप ज्यादा इंवॉल्व रहते हैं, तो बच्चों की रुचि, प्रकृति, प्रवृत्ति को समझते हैं और बच्चों की कमियों को भरते हैं।

हमारे यहां एग्जाम के लिए एक शब्द है- कसौटी। मतलब खुद को कसना है, ऐसा नहीं है कि एग्जाम आखिरी मौका है। बल्कि एग्जाम तो एक प्रकार से एक लंबी जिंदगी जीने के लिए अपने आप को कसने का उत्तम अवसर है। समस्या तब होती है जब हम एग्जाम को ही जैसे जीवन के सपनों का अंत मान लेते हैं, जीवन-मरण का प्रश्न बना देते हैं। एग्जाम जीवन को गढ़ने का एक अवसर है, एक मौका है उसे उसी रूप में लेना चाहिए। परीक्षा जीवन को गढ़ने का एक अवसर है, उसे उसी रूप में लेना चाहिए। हमें अपने आप को कसौटी पर कसने के मौके खोजते ही रहना चाहिए, ताकि हम और अच्छा कर सकें। हमें भागना नहीं चाहिए।

पुण्य सुन्या, 11वीं का छात्रा, अरुणाचल प्रदेश से- मैं कुछ सब्जेक्ट से पीछा छुड़ाने की कोशिश करती हूं। शायद मुझे उससे डर लगता है। इस डर को कैसे दूर करूं?

विनीता गर्ग, शिक्षक, दिल्ली- कुछ सब्जेक्ट ऐसे हैं जिनमें कई स्टूडेंट्स को डर का सामना करना पड़ता है। इस वजह से वे इनसे बचते हैं। इसके बारे में इतिहास या गणित जैसे शिक्षक अच्छे से समझ सकते हैं। टीचर के तौर पर इस स्थिति को और बेहतर बनाने के लिए हम क्या कर सकते हैं?

PM मोदी का जवाब- पसंद-नापसंद मनुष्य का स्वभाव है। कई बार पसंद के साथ लगाव भी हो जाता है। इसमें डरने वाली क्या बात है? ...पढ़ाई के लिए आपके पास दो घंटे हैं तो हर विषय को समान भाव से पढ़िए। पढ़ाई की बात है तो कठिन चीज को पहले लीजिए, आपका माइंड फ्रेश है तो कठिन चीज को पहले लेने का प्रयास कीजिए। कठिन को हल कर लेंगे तो सरल तो और भी आसान हो जाएगा।

जब मैं मुख्यमंत्री था, उसके बाद मैं प्रधानमंत्री बना तो मुझे भी बहुत कुछ पढ़ना पड़ता है। बहुत कुछ सीखना पड़ता है। चीजों को समझना पड़ता है। तो मैं क्या करता था कि जो मुश्किल बातें होती हैं, मैं सुबह जो शुरू करता हूं तो कठिन चीजों से शुरू करना पसंद करता हूं। आपको भले कुछ विषय मुश्किल लगते हों, ये आपके जीवन में कोई कमी नहीं है। आप बस ये बात ध्यान रखिए कि मुश्किल लगने वाले विषयों की पढ़ाई से दूर मत भागिए।

जो लोग जीवन में बहुत सफल हैं, वो हर विषय में पारंगत नहीं होते। लेकिन किसी एक विषय पर, किसी एक सब्जेक्ट पर उनकी पकड़ जबरदस्त होती है। जैसे लता मंगेशकर की महारत संगीत में है, हो सकता है अन्य विषय में उन्हें तनिक भी जानकारी न हो। टीचर के लिए मेरा सलाह है कि वे विद्यार्थियों से सिलेबस से बाहर जाकर चर्चा करें, उन्हें गाइड करें। टोकने के बजाय गाइड करें। प्रोत्साहित करें। कुछ बातें क्लास में सार्वजनिक तौर पर जरूर कहें ताकि हौसला बढ़े। कभी बच्चे के सिर पर प्यार से हाथ रखकर बताएं कि इस चीज में सुधार कीजिए।

नील अनंत, 12वीं के छात्र, तमिलनाडु से- कोरोना काल में हमें आम तौर के मुकाबले काफी खाली समय मिल रहा है। इसका उपयोग कैसे करें?

PM मोदी का जवाब- मुझे यह सवाल बहुत अच्छा लगा कि आप एग्जाम के समय भी खाली समय पर ध्यान दे रहे हैं, चर्चा कर रहे हैं। खाली समय, इसको खाली मत समझिए, ये खजाना है, खजाना। खाली समय एक सौभाग्य है, खाली समय एक अवसर है। आपकी दिनचर्या में खाली समय के पल होने ही चाहिए।

स्वांतः सुखाय यानी खुद को आनंद देने वाली चीजें कर सकते हैं। जब आप खाली समय अर्न करते हैं तो आपको उसकी सबसे ज्यादा वैल्यू पता चलती है। इसलिए आपकी लाइफ ऐसी होनी चाहिए कि जब आप खाली समय अर्न करें तो वो आपको असीम आनंद दे। यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि खाली समय में किन चीजों से बचना चाहिए, नहीं तो वो ही चीज सारा समय खा जाएंगी। अंत में रिफ्रेश-रिलेक्स होने के बजाए आप तंग हो जाएंगे। थकान महसूस करने लगेंगे।

खाली समय में हमें अपनी क्यूरियोसिटी, जिज्ञासा बढ़ाने की और ऐसी कौन सी चीजें हम कर सकते हैं जो शायद बहुत प्रोडक्टिव हो जाएगी...आपके मां या पिता अगर खाना बना रहे हैं तो उन्हें ऑब्जर्व कीजिए। नई-नई चीजों को जानने का जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।

अक्षय केकटपुरे, अभिभावक, बेंगलुरु से- बच्चों को गुड मैनर्स समझाने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?

प्रवीण कुमार, अभिभावक, पटना से- आज मां-बाप के लिए बच्चे बड़े करना थोड़ा मुश्किल हो गया है। कारण है आज का जमाना और आज के बच्चे। ऐसे में हम कैसे यह सुनिश्चित करें कि हमारे बच्चों का व्यवहार और आदतें अच्छे हों?

PM मोदी का जवाब- बड़ा कठिन सवाल है मेरे लिए। पहले तो आप स्वयं चिंतन करें, आत्मचिंतन करें कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि जीवन जीने का जो तरीका आप चाहते हैं, वैसा ही जीवन आपके बच्चे भी जिएं? अगर ऐसे नहीं होता तो आपको लगने लगता है कि पतन हो रहा है, वैल्यू का ह्रास हो रहा है। हमने जो अपना भाव-विश्व बनाया है, वो जब व्यवहार की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है तब बच्चों के मन में अंतरद्वंद्व शुरू हो जाता है। इसलिए मूल्यों को कभी भी थोपने का प्रयास न करें। मूल्यों को जीकर प्रेरित करने का प्रयास करें।

बच्चे बड़े स्मार्ट होते हैं। जो आप कहेंगे, उसे वो करेंगे या नहीं करेंगे, यह कहना मुश्किल है, लेकिन इस बात की पूरी संभावना होती है कि जो आप कर रहे हैं, वो उसे बहुत बारीक़ी से देखता है और दोहराने के लिए लालायित हो जाता है।

बच्चों के पीछे इसलिए भागना पड़ता है क्योंकि उनकी रफ्तार हमसे ज्यादा है। बच्चों को बताने, सिखाने, संस्कार देने की जिम्मेदारी परिवार की ही है, लेकिन कई बार बड़े होने के साथ हमें भी मूल्यांकन करना चाहिए। आपका बच्चा 'पर-प्रकाशित' नहीं होना चाहिए, आपका बच्चा स्वयं प्रकाशित होना चाहिए। बच्चों के अंदर जो प्रकाश आप देखना चाहते हैं, वो प्रकाश उनके भीतर से प्रकाशमान होना चाहिए।

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